कृष्ण उद्धव संवाद

उद्धव पूछते है प्रशन ,कृष्ण भगवान से।
आप ने पांडवो से सच्ची मित्रता निभाई कहाँ ईमान से।

चाहते तो युधिष्टर को जुआ खेलने से रोक देते।
या पासो को उनके पक्ष में मोड़ देते।

मामा शकुनि पासे पे पासा फेकते रहे।
युधिष्टर हारता रहा , आप देखते रहे।

आप के देखते देखते द्रोपदी दाव पर लग जाती है।
हस्तनापुर के इतिहास पर गहरा घाव कर जाती है।

कहने लगे श्री कृष्ण ,हे उद्धव, दुर्योधन बुद्धि और विवेक से चल रहा था हर चाल।
मामा शकुनी को खेल में आगे कर, बदल डाला खेल का हाल।

पांडवो ने मुझे प्रार्थना कर कक्ष में आने से रोक दिया।
बुद्धि और विवेक को छोड़ अपना सर्वत्र जुए में झोक दिया।

हारते हुए पांडव कोस रहे थे किस्मत को, उस क्षण में।
एक बार पुकारा होता अगर मुझको मन में।

एक पल में खेल का हाल बदल सकता था।
द्रोपदी के दाव पर लगने वाली चाल बदल सकता था।

मै कहाँ किसी को गलत कर्म से रोक देता हूँ।
बस हर कर्म को अपनी आँख से ओझल ना होने देता हूँ।

द्रोपदी को बालों से पकड़ दुशासन कक्ष से बाहर लाया।
द्रोपदी ने तब भी ना मुझको बुलाया।

जब द्रोपदी का चीरहरण होने लगा।
वो हरे कृष्ण हरे कृष्ण कहने लगी और हस्तनापुर रोने लगा।

भले ही उसने देरी कर दी मुझको पुकार लगाने में।
मैंने इक क्षण भी ना व्यर्थ गवांया उसकी लाज बचाने में।

         

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