जलजनीर

नीचे है प्रफुल्ल कमल, ऊपर है महानील
कुसमकोमल सी चन्द्रमुखी , अधर देखो नलिन

कामिनी तुम अप्सरा , बैठी सरोवर तीर
दर्पण देखो बन गया , जलज सरोवर नीर

तरुणाई है खिली खिली , कौमुदी तुम चाँद की
पैरों तले खिले जलज , कली खिली प्रभात की

नेह बन्धन बंध गया , तरुणाई ये लाज की
बाट कब से जोह रही , बयार ये मधुमास की

तम घनेरा छा गया , बीती बात रात की
चन्द्र किरण भी लुप्त हुई , रविकिरण प्रभात की

– उर्मिल📖✍# चित्कला

         

Share: