जिंदगी

सुकूं छोड़ कर झमेलों में
जा फंसी है जिंदगी
अपनों से निकल कर
परायो में जा बसी जिंदगी
मुझे लगता है निकल रही
उदास शाम सी जिंदगी
मीलों रेत के समंदर में
पानी का एक कतरा सी जिंदगी
आधुनिकता में रंगी
साँप और नेवले सी जिंदगी
कभी धूप कभी छांव बनकर
रिझाती सी जिंदगी
कभी दूर कभी पास आकर
मुझे बहलाती सी जिंदगी
मिट्टी के चूल्हों में
सुलगती सी जिंदगी
बारिश की बूंदों से
भीगती सी जिंदगी
जख्मी हुआ दिल
और छली गयी जिंदगी
जीना हुआ कठिन
पहेली सी बनी जिंदगी
नेकी की राह पर चलेंगे
बुलंद करेंगे जिंदगी
लाख बुरा कहे दुनियाँ
जिंदादिली से जियेंगे जिंदगी
इबादत उस खुदा की करेंगे
जिसने रहमतों के रूप में
बख़्श दी है हमें ये जिंदगी !

★वंदना★

         

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