जीवनराग

जीवनराग

कही ठंडे पानी की दरियाँ कही जलती आग हैं,
सुख दुःख के सुर ताल से सजती जीवन राग है l
कभी गिरती कभी सम्भलती और चलती रहती है ,
यह जीवन तो नया जीवन देने का जीवन पराग है ll
मझधार में भी जीवन कभी नहीं उकताता है ,
सुख दुःख के तिरो पर थोड़ा थोड़ा सुस्ताता है l
फिर चलता है यह अपने अनजाने सफ़र पर ,
चलते रहने को ही यह जीवनराग बतलाता है ll
रुपहले पर्दे पर किरदारे आती है और जाती है ,
कभी विरह गीत तो कभी वह मधुमास गाती है l
मिल कर बिछड़ना तो है बेदर्द खेल यहां का ,
नेपथ्य यहां पर सबको एक जीवन राग सुनती है ll
दर्पण में देख कर चेहरा खुद का रूप सजाती है ,
आँखों में काजल माथे पे बिंदियां खूब लगाती है l
इठलाती है इतराती है खुद ही वह शरमाती है ,
कथानक की व्यथा कथा को जीवन राग सुनाती है r
………………………BY : BP YADAV

         

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