झूठा जहान

जब सूरज के उगने की
बंदिश न होगी
चाँद के अस्त होने से
रंजिश न होगी
न होगा हवाओं का पहरा
न सर पे मजबूरियों का सहरा
न गहराई प्यार की जांचनी
होगी न ऊंचाई कद की मापनी
न होगा कहीं भरम
न कुछ जागरूकता का मरम
न जीने की कवायद होगी
न मरने का खौफ
न किसी पल तिलमिलाहट
होगी न कभी छटपटाहट
गुज़र लो इस जहान से जब
खुद के झूठे मान से तब

तब ही पुकारना हमे
होकर आज़ाद आंकना हमे
झूठे हैं बन्धन इस जहान में
तेरे मेरे मंथन हैं अभिमान के
@#मधूलिका

         

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