तेरे अल्लाह मेरे राम

ना मिले तुम अल्लाह से अपने, ना मिला मै अपने राम से।

क्षण क्षण हाथ से निकल रहा, फिर भी बैठे दोनों आराम से।

ना अमल में लाए तुम कुरान, ना लाया मै गीता ध्यान में।

तभी तो भेद दिखते है, मुझको अल्लाह और तुझको राम में।

शरीर तो माटी का पुतला, आखिर मिट ही जाना खाक में।

फिर क्या फर्क पड़ता है ,मेरे जलाने और तुम्हारे सपुर्दे खाक में।

बन्द आँखों से डूब जाए , तू अविनाशी अल्लाह और मै सर्वव्यापी राम में।

कहाँ भेद रह जाता है इक चेतना के दो नाम में।

         

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