दायजा

दायजा

विपत यौतुक पिता मन में।
भला कैसे जुटे धन में?
हुई तनुजा परायी जब।
छुटे भाई बहिन है सब॥

जलाये दायजा विद्युत।
चला फिर स्निग्ध कर क्यों धुत?
सजन सिंदूर तुम मस्तक।
न डालो नाक में नस्तक॥

अनिल आकाश तक प्रस्तर।
नहीं संदेश का उत्तर॥
कमल दुर्गम न सँवलाये।
विपिन विपुला न मुरझाये॥

क्षितिज धँसता धरा आँगन।
बहे शीतल पवन तन मन॥
नयन तिरछी रिझाये जन।
जिधर यौतुक सितासित धन॥

पथिक अनिमिष नयन विस्मय।
किलक कोयल करे अरु जय॥
मृषा नव प्रीति क्षीरोदधि।
अगम खाये मदन वर दधि॥

©-राजन-सिंह

         

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