खूब बनी कागज की ये नाव है

डगमग डगमग डोले मनवा, ,,,,,,,,,बाल हृदय अनोखा चाव है।
आओ देखो बंटी – बबली क्या खूब बनी कागज की ये नाव है।
पहली बूंद पावस की पाकर, हरित वसुधा का तनमन खिला।
प्रत्येक जीव का तन-मन हर्षा,खुशियों का सु-इन्द्रधनुष खिला ।

क्षितिज पार अम्मा कहती ,सुंदर, चंदा मामा का गाँव है।
देखो, उसी दिशा में चली जा रही कागज़ की ये नाव है।
भूचाल, प्रलय भले ही आए,तूफानों से भी न ये घबराए।
लहरों पर बलखाती जाए,बिन मोल दिए ये विहार कराए।

बैठा दो गुड्डे गुड़िया को, थक गए इनके पाँव हैं।
वर्षा ने नव ताल बनाया, जिसपे चली मेरी नाव है।
देखो बबलू! कहीं डूब न जाए पानी का तेज़ बहाव है।
ठुमक -ठुमक इतराती बोलो, क्यूँ अपनी ये नाव है?

देख चित्र यह मेरे मन में उठे प्रश्न बन भाव हैं।
जिंदगी की क्या बात करूं,बस कागज की नाव है।
गर्मागर्म तब खीर पसंद थी, आज भाजी पाव है।
कंक्रीट शहरों ने लूटी, बचपन की कागज़ नाव है।

दवा दुआ नहीं भर पाए, ऐसे हर दिल पर घाव हैं।
हंसमुख के मुखोटों के पीछे, छिपा अति तनाव है।
कहतें हैं इंसानियत का इस दुनिया में अभाव है।
लूट खसौट और भागदौड़ में फटी कागज की नाव है।

नीलम शर्मा…✍

         

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