नूतन युग की तुम हो नारी

—नूतन युग की तुम हो नारी—

जागो! उठो! आज तुम नारी
अब नवयुग का निर्माण करो
निज-श्रम के पावन प्रस्तर से
तुम आजादी की नींव भरो ।

तुम नारी सुकुमार सुमन-सी
संग में नुकीले ख़ार रहें
गर बढ़े आबरू पर कर तो
फिर हाथों में तलवार रहे।

चाहे ममता की तुम मूरत
कमजोर नहीं सबल तुम साहसी
वर्जनाओं की तोड़ बेडियाँ
वक्त पड़े तो बन दुर्गा सी।

हो आँधी या तूफान घनेरा
पथ पर कभी नहीं रुकना
तुम झांसी की लक्ष्मी बाई
हो कर विवश नहीं झुकना।

कहीं नहीं हो पुरुषों से कम
न ही तुम्हें कोई लाचारी
हर पद पर अधिकार तुम्हारा
नूतन युग की तुम हो नारी।
—राजश्री—

श्री—क्ष्मी्ी्ी्ी्ी्ी्मी

         

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