फिर मुझे निकलना है

ये जिंदगी हो रही अंधकारमयी
कठिनाइयाँ है कुछ पुरानी और नई ,
ऐ बादलों जरा सा रास्ता देना
चाँद बनके फिर मुझे निकलना है ।

ये लोग मेरे साथ मे जो चलते है
गिरगिटों सा रंग ये बदलते है ,
यारों ने गजब के दिए घाव मुझे
ठोकरें खाता हूँ फिर भी चलना है ।

ऐ बादलों जरा सा रास्ता देना
चाँद बनके फिर मुझे निकलना है ॥

कभी गिरती है संभल जाती है
कभी मौसम सी बदल जाती है ,
इश्क मे वफा मिले क्या मुमकिन है
जिन्दगी क्या फिर से मुझे छलना है ।

ऐ बादलों जरा सा रास्ता देना
चांद बनके फिर मुझे निकलना है ॥

रचनाकार
गजेन्द्र मेहरा ‘साहिल ‘
गाडरवारा (म.प्र.)

         

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