बस यूं ही……

बस यूं ही……
विश्वास, भरोसा, निष्ठा, यकीं और ऐतबार
लगी है सेल इनकी,बिक रहे सरे बाज़ार।

शब्दों के संसार में हैं,सर्वाधिक क्षतिग्रस्त ये,
हालांकि धोखे छल कपट से रहते हैं त्रस्त ये।

भरोसा और धोखा अक्सर पर्याय बन पूरक से लगते
भरोसे की गुणवत्ता पर ही तो हैं अनंत धोखे टिकते।

ईश्वर में विश्वास,भरोसे की उंगली थाम
अनजान डगर पर चलता अविराम।

जीवन में भरोसे का बने रहना सृष्टि में प्राण है
यही निष्ठा पवित्रता के निहित रहने का प्रमाण है।

बस सावन के भरोसे पर ही हम बीज रोप देते हैं
सभी पुराने पत्ते हर साल पतझड़ को सौंप देते हैं।

सात फेरे और वचनों के भरोसे
माता पिता अपनी बेटी सौंप देते हैं।

महज ताले के भरोसे गृहस्थ सौंप देते हैं लोग
कान्हा में विश्वास आस्था से ही मीरा ने चुना जोग।

शिशु रखता है डगमगाते हुए पहला पग
फकत ममतामयी जननी के भरोसे पर ।

एक अदद रोशनी की आस,कदम थमने नहीं देती
एक निष्ठा ही स्याह बियाबाँ में भटकने नहीं देती।

मत सोच नीलम, कितनों ने तोड़ा तेरा ऐतबार,
बस सोच कि कितनों को है तुझपे पूरा विश्वास।

नीलम शर्मा

         

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