बाचपन की यादे

थी धूलो मे सनती, वो बचपन की घड़ियाॅ।
और हाथो मे रहती थी,चूरन की पुड़िया।।

कभी वो पहनती थी,अम्मा की चुड़ियाॅ।
कभी ले के भगती थी,माटी की गुड़िया।।

गुजरता था संग,दोस्तो के पुरा दिन।
न जाने ये कैसा,अब आया बुरा दिन।।

न माटी की गुड़िया,न चूरन की पुड़िया।
न दोस्तो के संग,खिलखिलाती स्माइल।।

गुजर जाता है,एक ही घर मे बचपन।
न गुड़ियाॅ,न पुड़िया,हाथो मे,है मोबाईल।।

         

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