मनहर,मौलिक मजबूत स्त्री

सशक्त” स्त्री के सशक्तीकरण का फुंफकारता ढिंढोरा
कब थी कमजोर कोमलागीं? जब प्रकृति ने प्रकट किया प्रकोप
चमकती चंचल चपला
अंधड़-आंधी,और अनवरत ओलावृष्टि,
भयानक-भयंकर झंझावत,
गरजते-फटते बादलों के मध्य
तृषित,व्यथित मनुपुत्र
“सानिध्य पिपासु”
मनु पुत्र ने जब अपने को विदीर्ण कर
अर्धाग्नि को उपजित- उपलब्धकर
अपने भग्नहृदय ,भाग्य एवं कर्म मे शामिल किया?
या तब
जब वो
सहज सहचरी बन
अनुगमन करती हुई मनु पुत्र को अनुग्रहित करने लगी ,
कर सकी –
करती रही
और
कर रही है ? या कि तब
जब अनेकानेक मशालें प्रज्ज्वलित कीं
आस्तित्व,
ज्ञान, विज्ञान
और धर्म के सघन वन में?
या कि तब
जब प्रस्तरमूर्ति सी रही खामोश
साँसें गतिशील रहीं जतलाया बेहोश?
या कि तब
जब नाजुक कान्धों पर लादा
विसंगति, वर्जना, वैमनष्य का बोध और रचा गया
हर गाली का सूत्र?
या कि तब
जब चाहा सराहा दुलारा तुम्हें
आस्था की गली से गुजारकर विश्वसनीय बनकर खुद से ज्यदा चाहा तुम्हें ?
स्वतःस्फूर्त ज्वलन्त स्त्री
द्वैदीप्यमान मसाल सी
जो स्वयं प्रकृति हैl
ओ झरने सी उन्मुक्त
सूरज के ताप सी
गेहूँ की बाली सी लहलहाई ओस मे नहायी सी
चैतन्य हो ,,,,,
मूर्क्ष​ना की धुन्ध को
कर तिरोहित!
उठ !
नारी उठ !!
बतला कि क्या हो तुम!!!

         

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