मन की तृप्ति भाव मे

तुम परिंदे आसमाँ के मै नारी हूँ धरती की

… तुम बादशाह खुशियों के मै पीर हूं कोई गहरी सी

… तुम उजाले चाँद के मैं किरण हूँ कोई छिपती सी

… तुम हो भाल हिमालय के मैं धार हूं कोई बहती सी

… तुम शब्द हो गीता के मैं टीस हूं कोई घटती सी

… तुम कसी शिल्प में कविता से मैं छंदमुक्त इक रचना सी

……. तुम सुर लय ताल में बहते से मैं इन भावों पर ठहरी सी …..

         

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