माँ

एक माॅ ही है जो मुझसे,कभी नाराज नही
होती।
मुशकिल है माॅ की भावनाओ को
“कागज दिल”पर लिख पाना।
क्योकि याद है मुझे वो माॅ को सताना।
मुमकिन नही माॅ कि ममता बताना।

*मेरे बचपन मे मेरा मचलन,
बत बत पर मेरा परेसान करना।
बाहर से लड़ाई कर के आना,
और माॅ की आचल मे छुप जाना।।
कभी पैसो के लिये रोना,
तो कभी खिलौने को पाना।
हर छोटी-छोटी बात पर,
माॅ को। सताना।।
फिर भी माॅ मुझे मनाती,
बड़े प्यार से समझाती।
मेरे ना समझने पर भी माॅ आपा नही खोती।।
………..tएक माॅ ही है जो मुझसे,
कभी नाराज नही होती।……

*मुझे आज भी याद है,
वो बचपन के दिन।
जब मै पैसे लेता था,
माॅ से गिन-गिन।।
कही से भी लाती मगर,
मुझे एक रूपये जरूर दे जाती।
जब कभी बाजार जाती,
मेरे लिये जरूर कपड़े लाती।।
मै कपड़ो को देख कर,
बहुत खुश हो जाता।
जब माॅ मुझे, अपने हाथो।
से पहनाती।
……एक माॅ ही है जो मुझसे,
कभी नाराज नही होती।…..

*मगर उसकी फटी साड़ी देख,
मेरी इछा विचलित होती।
मै माॅ से पूछता अम्मा,
अपने लिये नही लाई धोती।।
वो मुझे अपने पास बुलाती,
बड़े प्यार से समझाती।
बेटा तेरे पास नही थे ना कपड़े,
तू पहन ले मेरे पास तो बहुत है धोती।।
मै समझ जाता,माॅ के पास नही बचे होगे
पैसें।
तभी बोल रही है ऐसे।
मगर फिर भी वो खुश होती।
……..एक माॅ ही है जो मुझसे,
कभी नाराज नही होती।….
एक माॅ ही है जो मुझसे,
कभी नाराज नही होती।….

         

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