मुस्कान और मानसिकता

मुस्कान लिए फिरते हैं, देखो बनावटी चेहरे हैं।
क्या कहूँ चेहरों की बातें, भाव नकली उकेरे हैं।

भीतर मन-मन छल कपट, वाणी फूलों के सेहरे हैं।
अपनेपन के भाव न जाने, किस सराय में ठहरे हैं।

झूठ फरेब के घात-प्रतिघात से, हृदय घाव सा रिसता।
कुंठित,संकीर्ण,ओछी सोच हुई,,,हृदय चोर है बसता।

मतलब के चूल्हे पर देखो,हर रिश्ता रोटी बन सिकता।
कितना किया प्रयास नीलम, नहीं बदली मानसिकता।

नीलम शर्मा…..✍️

         

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