मैं बनाम अहम

जीवन की आपाधापी में सूनापन ही संग बस रह गया
हाय,मतलबी गिद्धों के बीच इक ठूंठा तरु बस रह गया
थी कभी हरियाली मम जिंदगी और वृद्ध वृक्ष पर
आज उस हरियाली का बस सुखद सपना रह गया।
मैं,मेरा परिवार,मेरी ज़रूरतें,लालच हीं अहम रही।
चलते मनु लालच के तेरे, आज अचला भी ढही।

देख मुझे, मंडरा रहे हैं, कर्कश वाणी में बता रहे हैं।
पैनी चौंच वाले भयावह,जन्मों से भूखे जता रहे हैं।
मनु ने ही उजाड़ी हरित भूमि,कर रहे हैं आज सिद्ध।
ले जलूस, खुद न्याय करने आ गए हैं खूंखार गिद्ध।

अब भी मौका है संभल जा,
रोप सुख के बीज नवल जा।
जब खूब उजाड़े बाग उपवन,
अब कर उपजाने की पहल जा।

जुड़जा जाकर जंगल, गाँव, पशु-पक्षी,
पेड़-पौधे, नदी-पोखर-तालाब से तू ऐसे।
जुड़ रहें हैं आज के बच्चे ज्यूं, चलचित्र, कम्प्यूटर,मोबाइल,वीडियो गेम से जैसे।

वरना यूं ही खुले आकाश में दिखेंगे,भटकते खूंखार गिद्ध
सबके-सब हैं नोचकर खाने में कुशल और अति प्रसिद्ध।
हां मिलेंगे घर की मुंडेरों पर ये, नव आने वाली पीढ़ी को
बुगलों का वेश धर खा जाएंगे संस्कृति-सभ्यता, रूढ़ि को।
अपनी ही प्रजाति की लुप्तता का रच रहा मनु तू अभिनय
बख्श दे प्रकृति को, है करती नीलम करबद्ध निवेदन विनय।
नीलम शर्मा

         

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