कभी भी रावण मरा नही था

फिर रावण को जला रहे हो , कैसी खुशियाँ मना रहे हो ।
पुतले उसके जला जलाकर , क्या दुनिया को दिखा रहे हो ॥

कभी भी रावण मरा नही था , रावण आज भी जिंदा है ।
मन मंदिर में छिपकर बैठा , बहसी एक दरिंदा है ॥

बाबा जैसे ढेरो रावण , जब चेहरा ढक लेते है ।
सीता जैसी भोली जनता , सहज ही ये ठग लेते है ॥

ऐसे बाबा का तो , सबसे पहले पर्दाफाश करें ।
रावण को पहचाने पहले , और फिर उसका नाश करें ॥

बहु बेटियों की इज्जत की , रक्षा हो ये काम करें ।
फलाहारियों के चक्कर में , खुद को न बदनाम करें ॥

मन के पाप मिटाओ सारे , रावण का संहार करें ।
सिस्टम स्वतः साफ हो जाए , यूँ नाभि पर वार करें ॥

कूड़े-करकट के पुतले से , वायु न बर्बाद करें ।
बस ऐसे रावण को मारे , और खुद को आबाद करें ॥

रचनाकार
गजेन्द्र मेहरा ‘साहिल’
गाडरवारा (म.प्र.)

         

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