वाह रे वाह जमाना

वाह रे वाह जमाना,

मिलती न जिन्हें आधुनिकता,सुख,प्यार
तो शुरु करते हैं अत्याचार,
भुलाकर मानवता की सीमा
रच ढोंग अध्यात्म का,
चलाते हैं व्यापार
वाह रे वाह जमाना l
मानवता का ज्ञान न जिसको,
वह खुद को ईश्वर का प्रतीक बताता
राम-रहिमन की मर्यादा की,
है बोली ऊँचे मंचों से लगाता
वाह रे वाह जमाना l

पहन फकीरों और बाबाओं का चोला,
जग लूट-लूटकर खाता है
पढ़ा-पढ़ाकर पाठ घृणा का ये,
जग हिंसा खूब करवाता है
वाह रे वाह जमाना l

जब तक मिले न सजा कुकर्मों की,तो
अच्छी सरकार सब कुछ है अपना
मिलती सजा जब पल में,
शुरू करते हैं विद्रोह करना
वाह रे वाह जमाना l

         

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