वीरां गाँव

ग़मगीन सूनी सारी गलियाँ,उजाड़-वीरां सारे गाँव,
कंक्रीट हृदय,उजड़ी बस्ती,नहीं शेष पेड़ों की छाँव।
निर्जन नहीं गाँव कूचे गलियाँ रिश्ते भी वीरां हुए हैं,
सुन,झूठे मुखोटों के पीछे,बस कौवों की काँव काँव।

घुट रहा नित दम दियों का,नित लूटता तम रौशनी को,
वीरां शहर, वीरां पहर,वीरां नगर, वीरां हुई है हर डगर।
नज़रें नज़ारे ढूँढती हैं,कहाँ खो दिया इंसानियत को,
घर बनें मकान पाषाण बस, कंक्रीट अब सबका जिगर।

बंजर बना वसुधा को,मानव ने बेसुध धूनी रमाई,
जंगल उपवन विध्वंस किया ज्यूँ बेवा की कलाई।
आत्महत्या दीपक हैं करते, छाया तम घर आंगना
वहीं विकास के नाम पर हो रही नीलम इंदु पर चढ़ाई।

नीलम शर्मा…✍

         

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