सब बिकाऊ है

आम आदमी की यहाँ करता फिकर कौन
घर बैठे यहाँ पे ईमान बिक जाते है ।
भँवर मे राजनीति के जब कोई आन गिरे
चंद पैसे फेंक दो इंसान बिक जाते है ॥

वफा की उम्मीद बेवफाओं से न करना तू
यहां अच्छे खासे वफादार बिक जाते है ।
अमीरों की बस्ती मे अपना भी नाम करें
इसी चक्कर मे घर बार बिक जाते है ॥

बालाएँ जो व्रत करतीं है भोले बाबाजी के
प्रसाद के चक्कर मे सोमवार बिक जाते है ।
नौकरी लगी तो बेटा बीबी लेके भाग गया
पढ़े-लिखे लोगों के संस्कार बिक जाते है ॥

शहीदों की याद में तो फूल नही दिया कभी
वेलेंटाइन को फूल एक हजार बिक जाते है ।
सोना-चाँदी , हीरा-मोती बेशकीमती हो चाहे
जंग लगे रद्दी के सामान बिक जाते है ॥

बाजारू है हर चीज सब बिक जाती यहाँ
मिट्टी के खिलौने और भगवान बिक जाते है ।
दहेज की मांग जब बेटी का ससुर करे
”साहिल” जी जमीन और मकान बिक जाते है ॥

रचनाकार
गजेन्द्र मेहरा ‘साहिल’
गाडरवारा (म.प्र.)

         

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