” समाज चुप क्यों रहता है “

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डायरी के पन्ने पलटे कोरा , कागज ,करे इन्तजार ।
उठो कलम फिर से करते , दिल , से शब्दों के मोती तैयार ॥
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अबलाओं की अस्मत लुटती
समाज चूप क्यों रहता है ।
हर कदम पर औरत को ही
सब कुछ सहना पड़ता है।
बचपन से मृत्यु तक उसको
प्रत्येक पूरुष उसे छलता है।
बिन औरत के वंश चले ना
फिर क्यों उसे ही रोंदता है ।
अधखिली कलियों को फिर क्यों
बेदर्दी से मसल वो देता है।

ढोंग यहां पर करते हैं सब
इंसानियत का दम्भ भरते हैं ।
पूरुषों के बेदर्द समाज में
आवारा दिल मचलते हैं ।
मन्त्री हों या हों नेता जी
जनता से सरोकार नही ।
दुखड़े कितने जनता रोये
बिन पैसे दरकार नहीं ।
चुनाव अगर फिर आ जायें
उनसा कोई मददगार नहीं ।
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मेरी कलम आती ही रहना ” कागज ” को तुम सहलाने
सत्य के मोती ही चुनना ” दिल ” से लिखो अफसाने ॥

– उर्मिल 📖✍#चित्कला

         

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