स्वयंसिद्धा

 

विश्व को तू  दे संदेसा

मैं स्वयंसिद्धा हो चुकी हूँ ।

वर्जनाएं तोड़कर

सिर पर पड़ा पल्ला

अब कमर में खौंस

जीवनरण में उतर चुकी हूँ ।

स्व के चेतन का नया भान

मैं इसमें बस ‘मैं’ ही हूँ

दिया दान का चोला फैंक

खुद की पहचान हो चुकी हूँ।

अग्रगामी बनना लक्ष्य नहीं

अनुगामी होना सह्य नहीं

मैं श्रद्धा अपने मनु की

सहगामिनी हो चुकी हूँ ।

विश्व को दे संदेसा

मैं स्वयंसिद्धा हो चुकी हूँ।

तनूजा उप्रेती,

         

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