अल्फाज़

बहुत खूबसूरत गजल लिख रही हूं
तुझे सोचकर आजकल लिख रही हूं

दिन मुस्कुराहट तो रातें हैं साया
तुझसे हैं महकी ये ठंडी हवाएं
शायद नजर तेरी पड़ रही है
मदमस्त सी हैं जो ये फिजाए
आँखों को गहरी नीली सी झीलें
तो होठों को तेरे कमल लिख रही हूं

तुझसे मिलन हो तो कशमकश है
और ना मिले तो एक बेकरारी
बड़ी मुश्किलों से गुजरते हैं लम्हे
कैसे उमर जायेगी गुजारी
न तुझसे पहले ना बाद तेरे
तुझे बस तुझे हर पल लिख रही हूं ।

         

Share: