उसने कहा – क्या पता

अतुकांत कविता

*क्या पता*
मैने पूंछा?-
‘तुम्हें शापित संसार की-
अखण्डता और नश्वरता
यकीनन प्रतीत होती है।’
विचाराधीन होकर उसने कहा-
‘क्या पता?’

मैने पूंछा?-
‘व्याकुल व्यथित हृदय की-
अभिव्यक्त अभिलाषायें,
सार आधारित होती हैं।’
उसने एकटक होकर कहा-
‘क्या पता?’

मैने पूंछा?-
‘स्वप्न सम्बन्ध–
नेत्र संगमन या मननशीलता पर आधारित होते हैं।’
उसने पलकें झुकाते हुए कहा-
‘क्या पता?’

मैने पूंछा?-
‘निर्झर के झरने का स्वर,सुरभित पवन-
स्वागत करती है,
सृष्टि के अमूल्य सृजन का।’
उसने अंगडाईयों से कहा’
‘क्या पता?’

उसके नुमायशी मुख के-
भावों को पढकर।
अभिलाषित हृदय के आधार से,
आँखों की उमंगों का परीक्षण कर,
मुस्कुराती देह का रुख अवलोकन कर।

मैने पूंछा?-
‘तुम्हारे हृदय भाव,विरहित हृदय की वेदना-
किसकी प्रतीक्षा में तप्त है?’
उसने आँखों में देखते हुए कहा-
‘क्या पता?’

उसने पूंछा?-
‘संसार में मृत्योपरांत-
क्या सत्य है?’
मैने कहा-
“विछोह”

उसने पूंछा?-
‘पृथ्वी-आकाश,चन्द-चकोर,लहर-तट,आत्मा-परमात्मा का विछोह-
प्रेम का ही रुप है।’
हृदयालिंगित होते हुए दोनों का समूह स्वर-
*”क्या पता?”*

नाम-कृष्ण कान्त तिवारी “दरौनी”

         

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