गुलाब ….प्रेम का प्रतीक .

डायरी के …पन्नों के बीच
सिमटकर …सिकुड़ …कर
रह ……जाती ….हैं….
खुशबु ….बिखेरते ….हुयें
झड़ी …सूखी … मुरझाई ..सी
गुलाब की …..पंखुडियां
अस्तित्व …कि.. तलाश में
भटकतें ….हुयें ….भी
नहीँ …खोती …
अपना …..वजूद
शायद ……….इसलियें
गुलाब को …..प्यार का
प्रतीक …माना… जाता.. हैं
सुनों!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
प्रतीक ..बदलतें …नहीँ
किसी भी …परिस्थिति ..में
निश्चित ..होता हैं…
उनका …..मान
बिलकुल ….
मेरे ..मौन …प्यार की….तरह…..

कपिल जैन

         

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