तुम फ़रिश्ते हो क्या??

सुनो
कोई बंधन नहीं
मगर बंधी हूँ
फिर भी,,,,
बातें करती हूँ
प्रसंग अंतहीन
प्रश्न बेमतलब के
तुम सँग बस
यूँ ही,,,,
बकबक करना
आदत में शुमार
कब क्यों कैसे
हुआ
नहीं मालूम
मुझे,,,,
कानों को
सुनाई भी
वो सब ही
अब देता है
जो कहा ही
नहीं कभी
तुमने,,,,

सुनो
हँसती हूँ अब
आईने के साथ
और
रो भी लेती हूँ
बिन बात
तकिये के साथ,,,
बनाती तो हूँ
बादलों में अक्स
अब भी
पर न जाने कैसे
कूची उकेर देती
हरबार तुम्हें ही,,,
हिचकी भी अब
बदमाशी सीख
करती है परेशान
मुझे,,,

सुनो
तुम फ़रिश्ते हो क्या???

शुचि ‘भवि’

         

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