तेरा – मेरा कल

तेरा – मेरा कल
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कुछ याद भी है,या सब भूल गई हो।
तन्हा तेरे सवेरे का,कभी मै,
सूरज हुआ करता था।
तेरे ह्रदय में कभी मेरा,
बसेरा हुआ करता था।
मेरी गैर-हाजरी से जब,
तुम परेशां होती थी।
होके बेचैन जब तेरी ओर से,
कोई पैग़ाम आया करता था।
वो दरख़्त जो की,ईंट की दीवारो से,
लेने को सांस,बहार निकल आया था।
उसके हरे पत्तो पे,
कभी मेरा नाम हुआ करता था।
सब की नजर से बचा के तुम,
मेरे अहसासो को छुपा लेती थी।
बैठ उसी दरख़्त के निचे।
जब तुम मुझे ना आने का,
उल्लहाना देती थी।
और मै अपने हाथो से छू के तेरे कपोलों को,
तुझे दिलासा देता था।
अजीब मोहब्बत ये ,
दिल का रिश्ता, तेरा-मेरा।
जब मै और तुम,
अपने आवरण बाहर आ जाते थे।
तब तेरी बेचैनी में सिर्फ मै हुआ करता था।
अकारत.तेरा-मेरा मिलना,
अंतस मे एक भाव तेरे,
मेरे प्रति घर गया था।
ताप रहित मेरी मोहब्बत ने,
जब तुझे बाँहो में समेटा था।
लोहपथ पे चलती तेज़ गति से आती हुई,
सवारी पे सवार थे हम।
तेरी मेरी मुलाक़ात का,
वो गतिमान लोहगामणि,
हमारे सफ़र का अभिसार था।
लबरेज़ रहती थी तुम,
सदा ही दुःख से।
किसी की जुदाई का तुमपे,
मर्मस्पर्शी साया था।
ऐसे ही किसी स्थिति में
मेने तुझे पाया था।
मेरी फितरत में मोहब्बत का,
जो दरिया बहता था,
उसी दरिया में तूने,
मुझे, डूब के पाया था।
कुछ याद भी है या सब भूल गई,
तन्हा तेरे सवेरे का,
कभी मै सूरज हुआ करता था।
अंधेरी तेरी रातो का कभी ,
मै उजाला हुआ करता था।।
साथी मुखर्जी ( टीना.)

         

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