दिल्लगी

कही और कैसे जाऊ, मेरी दिल्लगी है तुझसे।
तेरे बिन ओ मेरी सजनी,रहा जाये अब ना मुझसे।।
करता हूॅ अब बया मै,दिल की अवाज अपनी।
अंदाज अक्षरो के”काॅगज दिली यूॅ लिख के।।
*तू ने किया था वादा, तुझे छोड़ कर न जाऊ
हर दम रहूॅगी तेरी-तेरी कसम है खाऊ
तूने, कर के मीठी बाते,मेरे दिल मे घर बनाया।
सपने दिखाये लखो,बस तेरी हूॅ जताया।।
आदत बना के अपनी,बरबाद कर के मुझको।
ठुकरा के चल दी ऐसे,आई दया ना तुझको।।
जाऊ कहाॅ तेरे बिन,इतना बता दे मुझसे।
…..कही और कैसे जाऊ मेरी दिल्लगी है तुझसे।……..
*जीते जी तूने मारा,अपना मुझे बना कर।
आवारगी मे गुम था,यारो मे जाॅ पना कर।।
चाहत नही थी कोई,जीता नही था झुक कर।
घुट-घुट के जी रहा अब,तेरे ऐहशान है ये मुझ पर।।
मैने था क्या बिगाड़ा,क्या दुशमनी थी मुझसे।।
….कही और कैसे जाऊ,मेरी दिल्लगी तुझसे।।…..

         

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