नयन मेरे तू दीपक बन के जलना

नयन मेरे तू दीपक बन के जलना,
मोम सा घुल रहा ये तन-मन,
सपना कोमल पलकों में नूतन,
लगे चांदनी ज्वाला का कण,
प्रियतम, मेरे पथ को रवि बन आलोकित करना,
नयन मेरे तू दीपक बन के जलना।

मन मयूर होके अब पुलकित,
होता धीमे धीमे कम्पित,
परछाई में करूँ तुम्हें ही चित्रित,
नाम तेरा ही अंक में अंकित,
प्रियतम,सांसो की सरगम में खुशबू बन के तुम घुलना,
नयन मेरे तू दीपक बन के जलना।

तू चंदा, मन हुआ चकोर,
मिलन बिछोह की एक ही डोर,
बन बैठा तू चित्त का चोर,
स्याह स्मित में नई सी भोर,
प्रियतम,पलकों की लहरों से हर मोती तुम चुनना,
नयन मेरे तू दीपक बन के जलना।

अधर मेरा बिन चुम्बित प्याला,
मै यौवन की हूँ मधुशाला,
नयनो को नयनों में डाला,
चख लेना कभी मिश्रित हाला,
प्रियतम, मधुप बन बगिया में मधुर गुनगुन करना,
नयन मेरे तू दीपक बनकर जलना।
—–शोभा किरण

         

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