पावस

कविता―पावस ऋतु

देख चुका हृदय अगणित पतझर,ग्रीष्म- शरद, हिम पावस सुंदर,
भूले बिसरे दर्द जगा कर,कर गयी विरह मम नैन समंदर

सजल नयन जब दृष्टि घुल गई, स्मृतियों के साथ-साथ
सुन,भर आईं नीलम आँखें,कंठ, हृदय बने,सागर सात।

अश्रु, पावस ऋतु बन बरसे,बूंदें ज्यूं घन तरकश के तीर
दामिनी रजत पंख लगाकर कड़की,विरहन उर हुआ अधीर।

पाती पी की आने से पहले,पावस पहली, लिख गयी गीत
राग मल्हार सम स्वर जगाती,वीणा झंकृत विरहन प्रीत।

उमड़-उमड़ रहे घुमड़- घुमड़,घन, घनघोर अति बरसाने वर्षा
घरड़ -घरड़ सुन गरज- गरज,प्यासी धरीणी- भू-धरा उर हर्षा।

छम छम बाज रहीं बूंदों पर,सु-थिरक रही प्रकृति अलबेली।
श्रावण मास में पड़ गये झूले,नटखट सखियां करें अठखेली।

हुलस हुलस कर कुहके कोयल,मधुर शहद सी उसकी बोली।
आ हाथ पकड़ बरसात में भीगें,हम तुम सजना चल हमजोली।

पावस मेह,वृष्टि,बारिश और बर्खा,पिया मिलन की आस जगाती।
होले से नटखट सखी पुर्वा कुछ कहकर,मोहे छेड़ छेड़ हाय जाती।

नव दुल्हन से खिले वन-उपवन,सुमन,तरु- ताड़,लता-वल्लरी,
मिटी तपन ज्वर ग्रसित धरती की,हुई अतिशय भाव विहल्ल री।

सुन वर्षा,संपूर्ण प्राणी जगत का,अमिट आस- विश्वास है तुम पर।
झमाझम बूंदों से प्यास बुझादो,बरसकर देश गांव,शहर,महानगर।

तेरी रिमझिम से सुन पावस ऋतु री,अचला करती सोलह श्रृंगार ।
तेरे आगमन से श्रावण में,छाई मनोरम-मनहर सुभाग बयार बहार।

कहे नीलम प्रिय वर्षा-वृष्टि,स्याह- श्याम मेघ-घन साथ ले आओ।
करुं करबद्ध अरज,नम्र-निवेदन,प्यासी वसुधा की प्यास बुझाओ।

नीलम शर्मा

         

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