प्रियतम मिलन

कविता
२२२२-२२२२ -२२
मंदिर में जाना अर्चना में माना
व्रत करवा को एक महिला पाना.
आशीष में सास की चाहत गाना
अचानक साईकल वाले गुजरना .
कुछ दिनों के लिये बाहर था जाना.
पीछे से रिश्ता पक्का सा सुन जाना
नये जीवन सपने मन में सजाना.
ज़ल्दी में सब कुछ पक्का हो जाना
देरी बातों का चले ना कह सुनाना.
जब पति लगे घर का जमाई माना
सादगी,शराफत साफगोही पहचाना
माना मुझको अपना जब सबकुछ
उचाट को तज मिला रिश्तों खजाना.
स्वरचित- रेखा मोहन ९/१/१९

         

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