मुझे प्रेम करना है

मुझे प्रेम करना है
आजीवन उसे,
भइया ने मंडप में
खड़ा कर दिया,,
सुन्न पड़ी देह ,
यहाँ बैठो, यहाँ उठो,
कुछ भी भान नही।
पहली बार इसे
तब देखा जब
इसके शहर ले जाई गई,
दिखाई के लिए,,
अपने परिवार के
साथ गाड़ी से उतरा,
भूधर,गोल,गहरा रंग
और खिड़की से तकती
मेरी सुनी आँखे,
अंदेशा था ,वही निकला
जार जार रोई,
बिना आंसुओ के,
दहाड़े मारी
बिना आवाज के,,
पैर कपकपाये
देह अर्थिंग वाले
तार से झूल गया,,
आंसुओ का सैलाब
बाहर के बजाय
भीतर बहने का हुनर
सीख गया,
बाबूजी याद आये
वो बिटिया
को एक सजीला
वर
जरूर ढूढ
देते,,
अम्मा साड़ी छटवाती
चूड़ी चुनवाती
कभी ये न् पूछा
कैसा लगा??
बहुत बड़े आँगन
दालान, कमरों से उठा कर
एक टूटी कोठरी में
बिठा दी गई,,वो
कोठरी भी
सामूहिक,,,,थी,
दर्द की इन्तहा
रोने नही देती,
तोड़ती है
टुकड़े टुकड़े
याद आया वो
प्रेम
जिसे लाजवश
छुपा गई थी
और कईं तहो के भीतर
अपने भीतर के
ऐसे गह्वर में
छुपा गई कि
लाख ढूढने पर भी
कोई ढूढ न् सके,
वो मनुहार करता ,
मैं लजा जाती

भइया की इज्जत
अम्मा की ठसक
याद आते ही
कभी उसे जता
न् पाई
कि तुम मेरे भी प्रिय हो,
इस छुपाने के खेल
में
लुट गई,,
वो आज भी
मेरे पास है
कोई नही छीन सका
न् अम्मा न् भइया
लेकिन उसे भी
नही पता
कि
वो मेरे पास है
आज भी
कभी गया ही नही ।।

         

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