प्रेम ….

 

प्रेम ….

जो पहले उलझाए फ़िर

सुलझा दे ज़िंदगी

देह से जन्म लेकर

आत्मा को घेर ले

नित्य,शाश्वत हो जाए

अतीत की छाया से अनजान

वर्तमान की सीमा से परे

भविष्य की आशंकाओं से दूर

हँसी की रेखाएं

पीड़ा के तार दोनों ही

दुतरफा जुड़ जाएं

जहाँ सूखी झुर्रीदार खाल

और गुलाब की पंखुड़ी

एक जैसे लगने लगें

सफ़ेद पड़ चुके बालों में

दिखे चांदनी बिखरी हुई

सारा विश्व सिमटकर

दो नैनों में समा जाए

एक अखंड विश्वास

स्थिर, अपरिवर्तित

प्रेम…..

दूसरे के क़दमों से

खुद तक पहुचने की

सुखद,अनंत यात्रा I

© तनूजा उप्रेती,

         

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