मैं तुम्हें लिखूंगी

अपनी कविता में भर- भर
एक दिन मैं तुम्हें लिखूंगी
शब्दों के सारे पर्वत लाँघ
कागज़ पर जी कर भरपूर
गुलाबों से हर पंक्ति सींच
मैं भी सुगंध में रचूँगी
अनंत भाव आकाश सा
अपनी बाहों में गहकर
सागर की सारी गहराई
एक प्रेमान्जुली में भरकर
मौन का दुष्कर बंधन तोड़
स्वर सरिता में आकंठ डूब
कलम में भर साहस की स्याही
एक दिन मैं तुम्हें लिखूंगी I
© तनूजा उप्रेती

         

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