रहा है।

क्षीर सिन्धु की लहर पर,
अक्स देखे है ठहर कर।
चाव से मृदु मुकुल मुख पर,
हीरे- मोती चुम्बन कर-कर,
प्रेम से प्रेयसी निरख कर,
चाँदनी से मिल रहा है।

दूध सी बहियां पसारे,
लहरों की पैंजनिया धारे।
आलिंगनबद्ध संग चंदा रे,
चाँद की आभा निहारे
चाँदनी चितवन पुकारे,
नव पुष्प मन में खिल रहा है।

हुए लीन दोनों ही अविचल,
लहरें चंचल शांत करतल,
निमग्न प्रेम उर सिंधु-तट-स्थल,
अनुभूति करते हैं उज्ज्वल,
चाँद चाँदनी निहारे अविरल,
प्रेम दीपक जल रहा है।
नीलम शर्मा ✍️

         

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