सुन मनमीत मेरे

जब भी बाँधना चाहा है तुम्हें
अपने शब्दों के बंधन में
मेरे शब्द रूठ जाते हैं
माना मौली के धागे कच्चे हैं
पर मेरी प्रीत के रंग तो सच्चे हैं
लेकिन जब भी रंगना चाहा है तुम्हें
अपनी प्रीत के रंग में
सारे रंग ही फीके पड़ जाते हैं
तेरे साथ बीते चंद पलों की
पूरी खूबसूरत ज़िन्दगी है मेरे पास
पर देखो ना……………
जब भी जीना चाहा है उन्हें
उन पलों को पंख निकल आते हैं
सुन मनमीत मेरे !!!
छोड़ो जाने दो इन बातों को
ये सारे बंधन तो बेमानी हैं
मैं मन में ही `मन’ को रख लेती हूँ
क्योंकि तुम ही कहते हो ना कि
मन के रिश्ते तो अमर हो जाते हैं।
—— सुनीता

         

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