हमसफर

 

सभी को सच्चे हमसफ़र नहीं मिलते
रिश्तों की शराफत भूले थे जनाब ।

बिछड़े मिले कभी राहों में फिर कहीं
अदब से झुककर आदाब करिये जनाब

तुम ही थे जो ना समझे आशिकी को
अब नाजो-शख्स उठाइये जनाब

कब तक उससे बचते फिरोगे बस्ती में
दोस्ती का फिर हाथ बढ़ाइए जनाब ।

ठुकरा दे गर तेरे साथ को वो यदि
नजरों में उसके थोड़ा उठिए जनाब ।

बिगाड़ा है तुमने तो बनाओ तुम ही
यूँ ही नहीं बनते ताजमहल जनाब ।

— जयति जैन “नूतन”, भोपाल —

         

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