अनाम प्रेयसी का खत

हे मिताक्ष !!
हे मिनाक्ष !!

भूल से भी कभी
अदृश्य तुम्हारी छवि पर
किसी मन्तव्य से राग न जगा मुझमें
!!
तुम्हारे अरूप रूप
डील-डौल या सुगढ़ काया से
प्राप्य काम्य की
कभी ख्वाब में भी कल्पना
न की मैंने
!!
फिर भी युगों से
अतृप्त नयन में ओस सा
तुम्हें सहेज कर रख लिया है
🌷
तुम्हारा हास.. सुरमई वात
तुम्हारा आनन… सुरम्य कानन
तुम्हारी बोली…..सुरभित कली
तुम्हारे पत्र… सुवासित इत्र
!!
मेरे मन आंनद कंद
गङ्गगीत में उठी तरंग से
तुम लहर लहर हिलोर लेते हो
मैं गुरुबाणी सा
तुम्हारे गूंजते उद्गोष को गाती हूँ
हर बार बुझते
मनदीप में आंसुओं का
सिंचन कर आती हूँ
!!
सुनो प्रियंवद !!
मेरे रेशे रेशे जिस्म में
तुम्हारे अहसास महसूस होते है
नयनों की नम कोरों पर
तुम्हारी प्रीत के बताशे मद भरते है
!!
मेरी सुप्तात्मा के
रूहानी किरदार, तुम ही तो
जीवंत रखोगे
मेरी आसमानी पुकार
मैं भर भर कलाइयों में तेरे छुआये
मृदुल अमलतास को
अंगीकार करूँगी
!!
पोर पोर महकते
मकरन्द का मधुपान करने
मधुप से तुम
मन आँगन में आ जाना
✍️

💝||आखिरी खत लिखे से पहले||💝

💫दीप💫
पारस प्रणीत !
सरस संगीत !!
हरस हितप्रित !!!

         

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