एक खत तुम्हारे नाम

तुम्हारी याद का कोहरा
जब घना होता जाएगा
और कुछ ना दिखेगा उसके आर-पार…
उस दिन मजबूर होकर लिखूंगी
एक खत तुम्हारे लिए
बिना पते का…….
तुम्हे ढूँढता हुआ मेरा मासूम सा खत
हर गली ,सड़कों , दरिया
सहरा ,पहाड़ों और समंदरों को
पार करता हुआ
ढूंढेगा तुम्हे पूरी दुनिया में
मेरा अनकहा पैगाम
तुम्हे देने के लिए……..
और फिर थक हार कर
एक दिन निराश सा
लौट आएगा
फिर मेरी ही दहलीज़ पर
खाली दामन लिए ……
हारे हुए उस खत को
सांत्वना कैसे दूँगी मैं
बोलो तो ???
क्योंकि उस दिन तो
मेरी जागती आँखों में बसी
खुद मेरी उम्मीदें भी
सो जाएंगी शायद
सदियों के लिए…………..
————— सुनीता

         

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