-एक खत माँ के नाम-

-एक खत माँ के नाम-

कैसे कहूँ
तूझसे दूर
कैसी हूँ माँ
जन्म दिया तुने
लेकिन तूझसे ही
मिल नही पाती हूँ
ताने जिनके सुनती हूँ
रोज उनके ही
नखरे ऊठाती हूँ

कैसे कहूँ तुझसे..

तेरे पास जब थी
मेरी भूख का एहसास
तुझे मुझसे पहले ही
हो जाता था
अब तो अक्सर ही
रोते-रोते थक कर भूखे ही
सो जाती हूँ

कैसे कहूँ तुझसे…

बिमार जब मै होती थी
ऐ माँ
तेरी रातो की नीन्द
ऊड़ जाती थी
रात भर जागकर तू
बाल मेरे सहलाती थी
यहाँ तो मेरी व्यर्था सभी को
एक बहाना लगता है
दर्द किसी से कहती नही अब
घुटकर ही रह जाती हूँ

कैसे कहूँ तूझसे…

जी करता है सब छोड़कर
तेरे पास आ जाऊ मै
तेरे आँचल मे छुपकर
गहरी नींद सो जाऊ मै
लेकिन इस बन्द पिंजरे को
तोड़ कहाँ मै पाती हूँ
जींदा होकर भी मै
ज़िन्दगी जी नही पाती हूँ

कैसे कहूँ तूझसे…

         

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