कड़वा सा सच

 

और क्या कर सकते हैं हम सब
टेम्परेरी डीपी बदल लेते हैं
रो लेते हैं,गा लेते हैं,लिख लेते हैं
एक निर्भया जाती है,
कुछ मोमबत्ती जलाते हैं
थोड़े नारे लगाते हैं
दूसरी निर्भया जाती है,
मार्च निकलता है
अख़बारों में लेख बढ़ते हैं
हम सब कुछ पढ़ते हैं
पान और चाय की दुकानों पर
चर्चाएँ चलती हैं
तीसरी निर्भया जाती है,
देश पर, समाज पर,ख़ुद पर
थूक लेते हैं हम भी,
पिक्चर बन जाती हैं-
अवार्ड भी मिलते हैं
फ़ेसबुक और व्हाट्स एप्प
मेसेज से भर जाते हैं,
रचनाएँ,कहानियाँ, उपन्यास
बहुत बहुत लिखाते हैं,
और फिर
एक और निर्भया जाती है…
……..
क्रम अनवरत-
हम पत्थरवत,,,
सभ्रांत समाज
हम भी सभ्रांत
सड़क से जाती बेटी को देख
फिर सीटी बजाते हैं
उच्च श्रेणी में
अपनी जगह बनाते हैं,,,,

शुचि ‘भवि’
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