जान बाकी है

वो अपने कौन लगते है ,
जो हम कुछ कर नही पाए ।
ज़ख्म क्या इतने गहरे है ,
जो अबतक भर नही पाए ॥
उस बेवफा की अब तलक
पहचान बाकी है ।
जरा सी देर ठहरो तुम
मुझमे जान बाकी है ॥

हमारे जलवे ऐसे है
कि हम पतझड़ मे खिलते है ।
घरों में कम ही रहते है
कि मैखानों में मिलते है ॥
कबसे जल रहे है दिल
बस शमशान बाकी है ।
जरा सी देर ठहरो तुम
मुझमें जान बाकी है ॥

मंदिर भी जाते थे वो
अब मस्जिद भी जाते है ।
जो चेहरे खिलते जाते थे
वो अब मुरझाते जाते है ॥
इश्क में लुट गया सबकुछ
बस ईमान बाकी है ।
जरा सी देर ठहरो तुम
मुझमे जान बाकी है ॥

रचनाकार
गजेन्द्र मेहरा ‘साहिल’
गाडरवारा (म.प्र.)

         

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