टूटा-टूटा सा मन

वसन्त की
वह एक
उदास दोपहर
छिटकी हुई धूप
पेड़ पौधे निस्पंद
टूटा टूटा सा मन
बार-बार
तुम्हारा चेहरा
इस मोड़ पर

मन की परतों से
धुंधली स्मृतियों का
एकाएक कौंध आना
जी उठना
कुछ भूले बिसरे चित्रों का

इन
स्मृतियों पर
धूल का एक कण भी
मुझे अच्छा नहीं लगता

वसुन्धरा पाण्डेय
***

         

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