ठूँठ

ठूँठ तरु का मेढ़ पर था
सूखकर अकड़ा हुआ था|
प्रतिष्ठा की भ्रामिक जड़ों में,
आज भी जकड़ा हुआ था|
बारिसें बे-अर्थ थीं,
आँधियों में सो रहा था|
साँझ नीरस आ गयी तो,
करुण स्वर में रो रहा था|
कह रहा था-
“छाँव की जब चादरें थीं,
पथिक भी तब ठहरता था|
पत्तियाँ सूखते ही परिन्दे उड़ गये|”

         

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