डियर’ जिन्दगी

लिखूॅ तो क्या लिखूॅ तुझपे ऐ जिन्दगी…
*
तूने जैसे चलाया मै चलता रहा।
तेरे संग मेरा पल-पल,यूॅ ढलता रहा।।
सुख कि घड़िया हो,या गम के शाये मिले।
तेरे कदमो से कदमे मिलाता रहा।
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जब पड़े थे जवानी में,मेरे कदम।
खूब “कगज दिली”खेल करता रहा।।
जब से उतरा था”कागज दिली”में ये दिल।
तब से बचपन को मै बस भुलाता रहा।।
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इश्क जिन्दा किया मुझपे ऐ जिंन्दगी।
लिखूॅ तो क्या लिखूॅ तुझपे ऐ जिन्दगी।।…
लिखूॅ तो क्या लिखूॅ तुझपे ऐ जिन्दगी।।…
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ख्वाब आॅखो में भर कर,जवानी के सुन।
दिन बदिन मैंने,बचपन घटाता रहा।।
याद आते हैं वो,अब तो बचपन के दिन।
अपने अम्मा को था,जब सताता रहा।।
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भागता था उतर कर के गोदी से मैं।
पानी से हर पल कपड़े भिंगाता रहा।।
नग्न पद घूम कर ग्रीष्म ऋतुओ में मैं।
अपनी अम्मा का जियरा जलाता रहा।।
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कितने ऐहशान है मुझपे ऐ जिन्दगी..
लिखूॅ तो क्या लिखूॅ तुझपे ऐ जिन्दगी…
लिखूॅ तो क्या लिखूॅ तुझपे ऐ जिन्दगी…

         

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