तुझे लिखते लिखते,ख़ुद ही को भूल गयी

तुझे लिखते लिखते
ख़ुद ही को भूल गयी
आज राह में जब मिली
अन्जान ख़ुद को ख़ुद लगी

इंच मात्र भी जो नहीं बदला
उसके लिए यूँ चूर चूर हूँ हुई
ज़ीस्त भी लगती है अब मुई
मौत क्यों अब तक नहीं छुई

सीढ़ियाँ जो सँग चढ़े थे कभी हम
अस्तित्व तक उतरी अकेले आज
नहीं बची कोई कसक नहीं लाज
जिंदगी सरल ये लिए मगर है राज़

दूर नेमतों का सूरज उग रहा तो है
जमी बर्फ़ सी देख रही हूँ अब उसे
रूह का आधिपत्य दिया था जिसे
उसने पूछ लिया आज ‘कब किसे’

किसी ज़र्रे में मिल ही जाऊँगी
ढूँढ लेना तुम चाहो जब मुझे
हँसी मेरी गूँजेगी ही कहीं तो
शायद तुममें ही मैं मुस्कुराऊँगी

         

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