नारी मन

सुन,
अक्सर झांका करतीं आंखें,काले घने बादलों बीच।
दूर धरा से रहते फिर भी,बंजर उर-मन को देते सींच।

यूं ही नहीं ताकता नारी मन,नीलम बादल चंद्रमा में
पाती खुद को उन दोनों में,सजल नैन शीतलपन में।

मन प्रबल पर इच्छा रखती,तुड़े-मुड़े से काग़ज़ सी
बीच भंवर में डूबे नौका, जैसे कश्ती काग़ज़ की।

भाव हृदय के अनकहे से,रचती बिन स्याही के कविता
गद्य-पद्य जीवन का हर पल, कभी अहिल्या कभी सीता।

ढूंढ रही क्या नीलम आंखें, मिला नहीं कुछ हाथ है रीता
व्यर्थ चिंता से चिता हुई क्यूं,भूल जा उसको, समय जो बीता।

नीलम शर्मा ✍️

         

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