व्यथित मन

**व्यथित मन**
अरे,
सुनो जरा
ये कौन रो रहा है
ये किसके सिसकने की आवाज है,
मैंने इधर उधर देखा,
कहीं कोई भी न था।
फिर देखा कि ,
मेरा मन रो रहा था
न जाने कितनी पीड़ा थी
कौन से दुःख को झेल रहा था
जब पूछा उससे मैने
व्याकुल होकर बोला
बच्चो से दुराचार
माँ – बाप पर अत्याचार
अब तो हद हो गयी
मासूमो पर हवस का वार
इन्ही से मन व्यथित है
दुखित मन से बोला

न नारी खुश है, न पुरुष सुखी,
बच्चो पर तो विपदा आयी है
अनाथआलय , वृद्धाश्रम में,
नयी चमक आयी है
बाजारों से गायब हो गये,
गुड्डे गुड़िया,
कहानी गायब हो गई,
दादा दादी की,
सदाचार अब मोरल है
सब कुछ ओरल है
संस्कार क्षीण दुनियां है
यह देख दिल दुखता है
किससे कहें,
चुप चाप मन रोता है।

” नीरज सिंह”
टनकपुर (चम्पावत)

         

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