सर्प संवेदना

$$$$ सर्प संवेदना $$$$
सुखद भोर की वेला में, नयनाभिराम हरियाली को।
विस्मित होकर निहार रहा था, मेढ पर एक कृषक खड़ा।
तभी कोने में दिखा अचानक,क्षत- विक्षत, रक्त रंजित;
अक्षम, मर्माहत, मरणासन्न, श्यामवर्णी सर्प पड़ा।
किंचित भय से गया निकट, देख अवस्था अति पीड़ाग्रस्त,
पूर्वाग्रह के पूज्य भाव से, सहायता को तत्क्षण आतुर।
सर्प देव यह गति तुम्हारी, प्रत्यक्ष है, हुआ है मानव घात;
निज जीवन की रक्षा हेतु, तुम्हारे दंश के भय से कातर।
फिर भी मानव धर्म स्मरण कर, हूँ तुम्हारी सहायता को तत्पर।
चलो औषधि उपाय हेतू , यदि किंचित विश्वास है मुझ पर।
व्यंग्य मिश्रित आह हल्की सी, प्रतिरक्षा से बोझिल स्वर।।
सर्प ने मुझे दर्पण दिखलाया, कहा- विश्वास? और तुम पर?
मुझ से तू जहरीला है मानव, मुझ से भयावह दंश है तेरा।
मेरे दंश से रक्षा संभव, उपचार रहित दंश है तेरा।
दूध पिला पंचमी का मुझको, वर्ष भर उसका सूद उगाहता।
एक दिन मुझको कर श्रद्धेय , फिर व्याध बन जाता मेरा ।
प्रत्यक्ष है, विषधर हूँ मैं, पर आवरित नहीं है विष मेरा।
अप्रत्यक्ष गरल मानव तेरा, जिस पर प्रतिक्षण छल बहुतेरा।
विषय धरता हूँ , छल, छद्म नहीं, बाहर भीतर है समता।
मेरा विष तो देहांतक है, तेरा विष क्षण- क्षण वध करता।
मेरे दंश में स्वार्थ नहीं है, निज रक्षा प्रयास है केवल।
तेरा दंश निज स्वार्थ हेतू, निर्मम , निर्दय करता आस्वादन।
विष, त्वचा व दंत मेरे, तेरे अर्थ उपागम का हैं साधन।
बन मदारी पाश में रखता, तेरे तुच्छ मनरंजन का मैं वाहन।
तुझसे ही तो बना मैं विषैला, मानव- दूषित वायु सेवन कर।
मैं तो केवल डसता हूँ, तुम करके हो मेरा भक्षण।
तेरा द्वेष, घृणा, स्वार्थ नहीं मुझ में, ना ही मानव सा मेरा आचरण।
तुझ जैसी क्रूरता नहीं मुझमें, ना तुझ सी पशुता, ना वहशीपन।
तुझ जैसा स्त्री भक्षक नहीं मैं, ना मैं तुझ सा
मर्यादा हरण।
मेरे केवल दंत में विष है, तेरा अंग प्रत्यंग विष रंजन।
सम्मुख से प्रहार है मेरा, पीठ के पीछे कोई वीर नहीं।
साम्प्रदायिक आग ना मुझमें, हाथों में धर्म तलवार नहीं।
ना धन लिप्सा, ना पद लिप्सा, कुर्सी की कोई तकरार नहीं।
प्रकृति का सरल जीव हूँ, प्रकृति विरूद्ध कदाचार नहीं।
इस गर्वित हृदय का दंभ ले गई, सर्प की उलझती टूटती श्वास।
निष्प्राण देह झकझोर रही थी,मेरी आत्मा के सुप्त एहसास।
पृथ्वी से मिला पार्थिव को, लौट चला मैं निज आवास।
परिमार्जित दृष्टिकोण लिए, परिवर्तित था मेरा विश्वास।।
®®रविन्द्र पुनियां व अनीता ढांडा (सहयोगी) की कलम सें ,,,,,,,,,,24/09/16 सर्वाधिकार सुरक्षित ®®

         

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